एक अजन्मी पार्टी का घोषणा पत्र
Monday, March 16th, 2009एक अजन्मी पार्टी का घोषणा पत्र
या
एक अस्तित्वहीन पार्टी का घोषणा पत्र
या
एक आदर्श घोषणा पत्र
(1) देश में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं जिनमें हम नई संसद चुनेंगे. वर्तमान सांसद - चाहे वे पक्ष में बैठे हों या विपक्ष में- कोई भी उनसे खुश नहीं है. इक्का-दुक्का सांसदों को इसका अपवाद माना जा सकता है. संभावना है कि इनमें से अधिकांश सांसद अगला चुनाव हार जाएंगे और यह तय है कि संसद का एक नया स्वरूप उभर कर आएगा. नई संसद वर्तमान से बेहतर होगी या उससे बुरी यह आने वाला वक्त ही बताएगा. फिलहाल इस मुद्दे पर कोई भी भविष्यवाणी करना उचित नहीं है.
(2) देश के ताजा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए मुझे पार्टियों के बीच किसी भी सैद्धांतिक या चुनावी गठबंधन की संभावना नहीं दिखती. जितने गठबंधन अभी तक बनाए गए न तो कभी उनका कोई वैचारिक आधार था, न ही इनका जनता के हितों से कोई सरोकार. इनका सिर्फ एक ही उद्देश्य था कि किसी भी तरह से सत्ता हथिया ली जाए. कल तक जो दुश्मन थे वो आज हाथ मिला रहे हैं और जो गठबंधन बना के चल रहे थे, आज वे एक दूसरे को बर्बाद करने पर तुले हैं.
(3) यह एक ऐसी पार्टी के घोषणा पत्र की रूप रेखा है जो सिर्फ लोगों के विचारों में है. ऐसे लोगों के जो कई मसलों पर एक जैसा सोचते हैं. और ये लोग सत्ता के खेल का हिस्सा तो नहीं हैं लेकिन एक बेहतर भारत में रहना चाहते हैं. ऐसे भारत में जिसकी कमान भरोसेमंद और कुशल हाथों में हो. हो सकता है कि इस घोषणा पत्र की बातों को आधार बनाने वाला गठबंधन या पार्टी कभी अस्तित्व में ही न आ पाए. लेकिन आम मतदाता के लिए यह इस तरह से उपयोगी है कि वे इसके आधार पर तय कर सकते हैं कि चुनावों में किसे वोट दें.
ताजा हालात के मद्देनजर हम पहले विदेशी मामलों की बात करेंगे.
(4) भारत इस समय बिल्कुल नई विश्व व्यवस्था से रूबरू है. यह उस दौर से बिल्कुल अलग है जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे. आज साम्यवाद पूरी तरह से असफल साबित हो चुका है और रूस तथा चीन भी नाममात्र के साम्यवादी देश रह गए हैं. दोनों देश मुक्त अर्थव्यवस्था की राह पकड़ चुके हैं. रूस कुछ हद तक राजनीतिक लोकतंत्र जैसा बर्ताव भी कर रहा है. अमेरिका इस समय विश्व की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति के तौर उभर चुका है. वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने अर्थशास्त्र के कई सिद्धांतों और व्यापार की परंपरागत कर पद्धतियों को किनारे कर दिया है.
राजनीतिक नेताओं की वर्तमान पीढ़ी के बारे में आमतौर पर माना जा सकता है कि वे वर्तमान विश्व से तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं हैं. लेकिन हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में कुछ ऐसी व्यवस्थाएं दी हैं जिनसे आगे की पीढ़ी तय कर सके कि भारत की विदेश नीति का संचालन कैसे हो. इससे संबंधित संविधान के 51 वें अनुच्छेद के मुताबिक
भारत
(अ) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा
(ब) दूसरे देशों से न्यायपूर्ण और बराबरी के संबंध रखेगा
(स) अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संधियों के प्रति सम्मान को प्रोत्साहन देगा, और
(स) अंतर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता को प्रोत्साहित करेगा.
(5) विश्व शांति और सुरक्षा हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी है. इसके अलावा दूसरे देशों से बराबरी के और न्यायपूर्ण संबंध रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संधियों का सम्मान या अंतर्राष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थता को प्रोत्साहन देना इस सबसे बड़ी जिम्मेदारी के छोटे-छोटे हिस्से हैं.
(6) तीस सालों का अनुसंधान बताता है कि जनतांत्रिक राष्ट्र आसानी से युद्ध में नहीं उलझते क्योंकि युद्ध के भयावह नतीजे इन देशों के सैनिकों के साथ-साथ कर चुकाने वाले नागरिकों को भी भुगतने पड़ते हैं.
(7) आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों ने मानवाधिकारों के एक व्यापक तंत्र के निर्माण की नींव रखी है. संयुक्त राष्ट्र में इनकी घोषणा तो 1948 में हो चुकी थी लेकिन इन पर व्यापक सहमति 1966 में ही बन पाई. जिन देशों में पूर्ण लोकतंत्र नहीं है वे अपने यहां मानवाधिकारों का सम्मान करने को दावा भी नहीं कर सकते. कई खामियां होने के बावजूद भारतीय लोकतंत्र एक जीवंत लोकतंत्र है. हमें दुनिया के हर हिस्से में लोकतंत्र को बढ़ावा देने की कोशिश करनी होगी. इस संदर्भ में भारत के लिए वह गौरव के क्षण थे जब भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए सहयोग पर सहमति व्यक्त की थी. नई सरकार की विदेश नीति का प्रमुख एजेंडा भी यही होगा. और भारत सरकार उन देशों को किसी भी तरह सहयोग और सहायता नहीं करेगी जो लोकतंत्र खिलाफ हैं और मानवाधिकारों का पालन जिनके लिए सिर्फ ढोंग है.
(8) 11 सितंबर 2001 और 26 नवंबर 2008 की आतंकी घटनाओं ने पहले से चल रहे अच्छाई और बुराई, तर्क और कुतर्क, आधुनिक सभ्यता और आदिम युगीन बर्बरता के संघर्ष को और तेज कर दिया है. अब समय आ गया है कि हम 100 साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट की उस बात को याद करें जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘हम युद्ध के बीच में हैं और ईश्वर की तरफ से लड़ रहे हैं.’
(9) पाकिस्तान से हमारे संबंधों को बेहतर करने की जरूरत है. दुर्भाग्य से पाकिस्तान के प्रति हमारा नजरिया देश विभाजन के बुरे अनुभव से पैदा हुआ है. हम कभी भी ये दावा नहीं कर सकते कि हमने पाकिस्तान के नागरिकों का दिल-दिमाग जीतने के लिए कभी कोई कोशिश की हो.
भारत ने हमेशा दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया है लेकिन हम भूल जाते हैं कि पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम जिन्ना ने पाकिस्तान के स्वतंत्र देश बनने के तुरंत बाद ही इस सिद्धांत को नकार दिया था. उन्होंने घोषणा की थी कि पाकिस्तान न्यायपूर्ण और उदारवादी जनतांत्रिक प्रणाली का देश होगा जो अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय और भारत के साथ दोस्ताना और सहयोगी रवैया रखेगा.
(10) यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन्ना स्वतंत्र पाकिस्तान में लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाए. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली की हत्या कर दी गई. और 1956 में इसका पहला और सबसे अच्छा संविधान निरस्त कर दिया गया. इसके बाद पाकिस्तान को कई बार सैनिक तानाशाही झेलनी पड़ी. पाकिस्तान के लिए वर्तमान समय अपनी अतीत की सारी गलतियां सुधारने का समय है. वहां इस समय फिर से लोकतंत्र है. पाकिस्तान के युद्ध समर्थक भी इस समय खामोश हो चुके हैं और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान युद्ध के परिणामों को अच्छी तरह से समझ रहे हैं. पाकिस्तान ने आतंकवाद का जो दानव दूसरों के लिए खड़ा किया था वह अब खुद उनके खिलाफ हो चुका है. इन हालात में प्रणव मुखर्जी को ये बेहूदा बातें रटना बंद कर देना चाहिए कि, ‘सभी विकल्प खुले हैं.’ युद्ध कोई विकल्प नहीं है. पाकिस्तान के साथ युद्ध न होने देने की संधि (नो वॉर पैक्ट) किया जाना चाहिए. और यह संधि इस तरह से बनाई जाए जिसमें कोई खामी न हो, जिससे कोई भी पक्ष बहाना बना कर पीछे न हटे. भारत और पाकिस्तान के पास मानने के लिए सिर्फ यही सबसे बेहतर विकल्प है. इस विकल्प को अपनाने की हालत में बाकी चीजें अपने आप सुधरने लगेंगी.
(11) जिन लोगों के पास लोकतंत्र है, संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य हैं साथ ही इन अधिकारों की रक्षा के स्वतंत्र न्याय व्यवस्था है. इसका मतलब है कि उनके पास आजादी है. कोई भी गतिविधि जो इन चीजों से परे और कुछ पाने के लिए की जा रही है वो सब आतंकवाद है या राष्ट्रद्रोह है या फिर दोनों है. कश्मीर की जनता से जुड़े मसलों पर भारत और पाकिस्तान दोनों को पारदर्शी रवैया अपनाने की जरूरत है. अतंर्राष्ट्रीय समुदाय को ये सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इस तरह से न हो जैसे कि साम्राज्यवादी देश अपने उपनिवेशों में करते थे. कश्मीर समस्या का समाधान तो बहुत पहले हो गया होता लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ये संभव नहीं हो पाया. इस समय राष्ट्रपति जरदारी मसला सुलझने को तैयार है, मनमोहन सिंह को मसला सुलझने की इच्छा दिखानी होगी. भाजपा चाहती है कि पाकिस्तान से सभी तरह के संबंध तुरंत खत्म किए जाएं. जनता को भाजपा के इस राजनीतिक दिवालिएपन और चुनावी उन्माद को नकारना चाहिए और जनता ऐसा करेगी भी. पकिस्तान के साथ सहज संबंध, वहां लोकतंत्र की स्थापना और सकारात्मक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होंगे. भारत की तरफ से युद्ध की आशंका वहां पर न सिर्फ अस्थिरता लाएगी बल्कि इस नाजुक वक्त में पाकिस्तान के पुराने दुश्मनों को और भी मजबूत करेगी. भारत को ये सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र में तब्दील न हो पाए.
(12) भारत और अमेरिका ने मिलकर आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने का संकल्प लिया है. लेकिन हमारे नेता लड़ाकों की बजाय पुलिस वालों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. उनका जोर इस बात पर होना चाहिए कि आतंकवाद का खात्मा किया जाए. लेकिन वे चंद आतंकवादियों को गिरफ्तार कर उन्हें न्यायालयों से सजा दिलाना चाहते हैं. हम लगातार ये कोशिश करते रहे हैं कि पाकिस्तान स्वीकार कर ले कि मुंबई हमले में शामिल आतंकवादी पाकिस्तानी थे. इसके बाद हम लगातार पाकिस्तान और अन्य देशों को इस आतंकी घटना से संबंधित सबूत सौंपते रहे. ये सब हमारी व्यर्थ की कोशिशें थीं.
भारत और अमेरिका को मिलकर पाकिस्तान को समझाना होगा कि उनके नव-लोकतंत्र के लिए आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा है. इस बीमारी के रोगाणुओं को खत्म करने के लिए उसे हमसे सहयोग करना चाहिए. इससे पहले कि आतंकवादियों के हाथ में परमाणु हथियार पड़ें इन तीनों देशों को मिलकर आतंकवादियों के ठिकाने खोजकर उन्हें पूरी तरह से खत्म करना होगा. आतंकवाद के चलते दुनिया भर में खतरनाक हालात बन चुके हैं. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती तब तक इस तरह के संगठनों को वित्तीय और अन्य तरह से मदद करने वाले देशों को ऐसा करने से रोका नहीं जाता.
(13) हमें पता है कि शिया और सुन्नी आतंवादी संगठनों की जन्मस्थली कहां है. हमें सुरक्षा परिषद को निर्णायक कार्रवाई करने के लिए समझना चाहिए. और यदि सुरक्षा परिषद की कार्रवाई को कोई देश वीटो अधिकार का प्रयोग कर रोकने की कोशिश करे तो हमें इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि हम आत्मरक्षा के लिए कार्रवाई कर सकें. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भी स्पष्ट किया गया है कि कोई भी देश आत्मरक्षा की कार्रवाई करने लिए स्वतंत्र है.
(14) पिछले दिनों हजारों मुस्लिम उलेमाओं सहित दारूम उलूम ने ये घोषणा की है कि इस्लाम में आतंकवाद की कोई जगह नहीं है. और पवित्र कुरान कहीं भी नहीं कहा गया कि महिलाओं, बच्चों और अन्य निर्दोष लोगों की हत्या नेक काम हैं. वर्तमान दौर में इस तरह की घोषणाएं बेहद उत्साह बढ़ाने वाली हैं. ये अलग बात है कि न तो इस घोषणा पर ज्यादा ध्यान दिया गया न ही इसका प्रचार किया गया.
आतंकवादी इतने कायर हैं कि वे सीधे सेना से लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते. आतंकवाद से लड़ने के लिए ईमानदारी और नैतिक रूप से बिल्कुल पाक-साफ होने की जरूरत है. जो देश किसी भी तरह से इनके मददगार साबित हो रहे हैं उनकी पहचान और जवाबदेही तय की जानी चाहिए.
(15) मध्यपूर्व के देश इस समय खतरनाक परिस्थतियों में फंसे हुए हैं. इन देशों के लिए नीति बनाते वक्त हमें नए तरीके से और दृढ़ होकर फैसले लेने की जरूरत है. हमें इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और न्यायपूर्ण तरीके से काम करने की जरूरत है. पिछले सालों में हमने कई निर्णय अपनी तात्कालिक चुनावी लाभ को ध्यान को रखकर लिए हैं, आगे ऐसा करने से बचा जाना चाहिए. जो देश आतंकवाद का समर्थन करते हैं या अपनी सेना को हत्या जसी आपराधिक गतिविधियों में लगाते हैं या संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य देश को नुकसान पहुचाने वाली गतिविधियों को अंजाम देते हैं, भारत ऐसे देशों का समर्थन और सहयोग नहीं करेगा. भारत धर्मनिरपेक्ष देश है और विश्व के बद्मिजाज देशों की नजर में हम काफिर हैं जिन्हें जिंदा रहने तक का हक नहीं है. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि किसी भी हालत इन देशों के हाथ परमाणु हथियार न पड़ पाएं. विश्व शांति के लिए सभी देशों को त्याग करना पड़ेगा लेकिन हम उन देशों की तरफ मदद का हाथ नहीं बढ़ा सकते जो अपने अस्तित्व बनाए रखने और खुद की सुरक्षा करने में नाकाम हो रहे हैं. हम युद्ध चाहने वालों को दरकिनार कर शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाने वाली कोशिशों को बढ़ावा देंगे.
घरेलू मुद्दे
(16) घरेलू मोर्चे पर भी हमें कुछ क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है. हमारी न्यायिक प्रणाली ब्रिटिश राज की अमूल्य देन है. इस व्यवस्था में कानून के एकीकृत स्वरूप, तकनीकि रूप से कानून प्रयोग की दक्षता, तथ्यों को अलग करने और सबूतों के सटीक विश्लेषण की क्षमता पर जोर दिया गया था. जोर इस बात पर भी था कि लोगों को सस्ता और शीघ्रता से न्याय सुलभ हो. लेकिन आज हर नागरिक जानता है कि हमारी न्याय व्यवस्था बिखर चुकी है. इन हालात में सरकार और संसद का पहला काम यह होना चाहिए कि न्याय व्यवस्था का पुराना गौरव फिर से बहाल किया जाए.
लॉर्ड ब्रॉगम ने कानून सुधारों पर अपने भाषण में कहा था, ‘अगस्टस खुद की तारीफ में कहता था कि उसे ईंटों का रोम मिला था और उसे संगमरमर का बना कर छोड़ रहा है. लेकिन क्या ये बेहतर नहीं होता कि वो ये कहता कि उसे महंगी न्याय व्यवस्था मिली लेकिन उसने इसे सर्वसुलभ बना दिया, इसे बंद किताब के रूप में पाया और खुले पत्र के रूप में छोड़ा, कानून को अमीरों की निजी विरासत पाया और गरीबों का अधिकार बना दिया और इसे दमन की दोधारी तलवार जैसा पाया और ईमानदारी का सेवक और निर्दोषों का रक्षक बना दिया.’
(17) भर्ती की वर्तमान पद्धति और न्याय व्यवस्था कि खामियों से निपटने के तौर-तरीके न सिर्फ अव्यावहारिक हैं बल्कि पुराने भी पड़ चुके हैं. भारत इसका अनुभव 1993 में कर चुका है जब पूरी तरह से पुख्ता मामले में महाभियोग सिर्फ इसलिए नहीं चलाया जा सका क्योंकि जिस पार्टी की सरकार थी उसी ने इस मामले में मतदान नहीं किया. इस तरह से महाभियोग साबित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटाया जा सका. यह ऐसा मामला था जिसमें संसदीय भ्रष्टाचार ने अपने हमजोली न्यायिक भ्रष्टाचार को बचाने में सहायता की थी.
(18) आज के हालात में न्यायधीशों के सामने सभी तरह के मामले आते हैं. और कई बार यह होता है कि जिस कानून के दायरे में मामले की सुनवाई हो रही है उसके बारे खण्डपीठ के कुछ या कभी-कभी सारे न्यायधीश ही अनभिज्ञ होते हैं. यदि किसी गंभीर आपराधिक मामले की सुनवाई ऐसी खण्डपीठ के सामने हो रही है जिसका एक भी न्यायधीश इस तरह के मामलों का जानकार होने का दावा न कर सके तो इसे वादी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा. इस तरह की स्थितियां वकीलों के लिए भी मुश्किल खड़ी करती हैं क्योंकि उन्हें हर बार ये सोचना पड़ता है कि वे संबंधित कानून पर कितना बोलें और क्या बोलें ताकि न्यायधीश को बात समझई जा सके.
जो न्यायधीश ज्यादा बातचीत करते हैं उन्हें तो अपना पक्ष समझना कुछ हद तक आसान होता है लेकिन कम बोलने वाले न्यायधीशों के सामने अपना पक्ष रखने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
इस बारे में कई बार सुझव दिए गए हैं कि कानून के संबंधित क्षेत्र की जानकारी रखने वाले न्यायधीशों की खण्डपीठ के सामने ही उस कानून के मामले रखे जाएं. लेकिन इन सुझावों पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. इन स्थितियों में सुविज्ञ वकील अदालत में बैठे-बठे न्याय का मखौल उड़ते हुए देखने को मजबूर हैं. इन परिस्थितियों की उपेक्षा हो रही है और व्यवस्था विरोध के स्वर भी नदारद हैं.
न्याय व्यवस्था की इन खामियों को दूर करने के लिए अलग से कानून बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि अदालत के मुख्य न्यायधीश के लिए कुछ परंपराएं विकसित करके ही इन खामियों को दूर किया जा सकता है.
(19) विदेशी निवेश और भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार इस बात पर निर्भर करता है कि अदालतें मामले निपटाने में कितनी दक्ष हैं और कितनी तेजी से मामले निपटाती हैं. भारत के संदर्भ में इसे घपला ही माना जाएगा कि अधीनस्थ अदालतों में 3 करोड़ और और उच्च न्यायालयों में दसियों हजार मामले अभी निपटाए नहीं जा सके हैं.
इस बात को विधि आयोगों ने भी बार-बार कहा है कि हमें अपने अदालतों की संख्या पांच गुना तक बढ़ाने की जरूरत है. नई सरकार को इस दिशा में तेजी से काम करना होगा.
(20) आपराधिक मामलों में बिना वजह देरी से कानून की सजा देने की क्षमता कम हुई है. इसके चलते अपराध और अपराधी बढ़ते जा रहे हैं ये समाज की सुरक्षा और स्थिरता के लिहाज से चुनौती बन गए हैं.
(21) आज से चार साल पहले ‘ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल’ और दिल्ली की रिसर्च संगठन ‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ ने भारत में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्ययन किया था. इन दोनों संगठनों के नतीजों में कहा गया था कि भारतीय हर साल 20 हजार करोड़ की रिश्वत देते हैं और ये रिश्वत सरकारी तंत्र के सभी स्तरों पर दी जाती है.
(22) भ्रष्टाचार हमारी अदालतों के सामने सबसे बड़ा मसला है. और ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे कानून निर्माता कैंसर की तरह बढ़ते भ्रष्टाचार से मुकाबला करने की बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. लेकिन जनता को पता है कि भ्रष्टाचार हमारे सरकारी तंत्र के हर हिस्से में घुस चुका है. और इसका सबसे बुरा पक्ष यह है कि अब यह बीमारी हमारी शीर्ष अदालतों में भी पहुंच चुकी है. पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों की अपनी संपत्ति उजागर करने में हिचकिचाहट से जनता की नजर में न्याय व्यवस्था को लेकर संदेह और गहराया है. एक बार जब जनता का भरोसा न्याय व्यवस्था से उठ जाता है तो समाज में अपराधियों और हत्यारों की पूछ-परख बढ़ जाती है. वैसे भी हमारे समाज में इन तत्वों की कोई कमी नहीं है.
(23) हमारे यहां कानून इन समस्याओं से निपटने में असफल हो चुका है. कहावत है कि कानून से चरित्र को नहीं संवारा जा सकता है इसलिए हमारे स्कूलों और कॉलेजों के पाठच्यक्रमों में नैतिक और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा अनिवार्य रूप से शामिल की जानी चाहिए. हमारे यहां तो ज्ञान-मंदिर कहे जाने वाले इन स्कूलों में भी बच्चों का दाखिला भ्रष्टाचार से दो-चार हुए बिना नहीं होता.
(24) वर्तमान लोकसभा में आम जनता ने नेताओं को नोट के बंडल लहराते हुए भी देखा है. इसलिए पहला कदम तो ये हो कि जनता विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बेहद ईमानदार लोगों को वोट दे.
(25) इस समय वैश्विक आर्थिक मंदी की मार सारी दुनिया को ङोलनी पड़ रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है. इसलिए भारत के संदर्भ में बहुत सोचसमझ कर आर्थिक नीतियां बनाने की जरूरत है. लेकिन इन नीतियों में बढ़ते भ्रष्टाचार को रोकने के लिए स्पष्ट रणनीतियां भी बनाई जाएं.
(26) जब हम आर्थिक मोर्चे पर सुधार की जरूरत पर जोर दे रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि दोबारा सरकारी नियंत्रण, लायसेंस और परमिट राज की नीतियां बना दी जाएं. क्योंकि ये समस्या का समाधान करने की बजाए खुद बड़ी समस्या हैं.
(27) इस समय हमारे वित्त मंत्रालय को कींस का अर्थशाष्त्र पढ़ने की जरूरत है. अमेरिका 1930 की आर्थिक महामंदी से इसी राह पर चल कर उबर पाया था. इसी तरह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तबाह हुए यूरोप का पुननिर्माण भी कींस की आर्थिक नीतियों से निकले उपायों से हुआ था. भारत सरकार को भी इस समय आधारभूत संरचनाओं के निर्माण और रोजगार के अन्य अवसर पैदा करने के लिए भारी निवेश करना चाहिए. इससे जो लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं उन्हें तो नई नौकरी मिलेगी ही साथ ही और बेरोजगारों को भी रोजगार मिलेगा. निवेश के लिए निजी क्षेत्र की सरकारी फंड तक पहुंच आसान बनाए जाने की जरूरत है लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाए कि इसके लिए तगड़ी निगरानी व्यवस्था हो ताकि पैसे का दुरुपयोग रोका जा सके.
(28) हमारा बहुधर्मी और बहुभाषी समाज आगे बढ़ता रहे इसके लिए जरूरी है कि सभी विभाजनकारी दीवारों को गिराकर सिर्फ एक पहचान - भारतीयता - को मजबूत करने की दिशा में काम हो. कम से कम ‘पहचान’ होने की शर्त बेहतर तालमेल का विकास करेगी. और यह तभी सुनिश्चित होगा जब हमारा समाज धर्मनिरपेक्ष हो और इसके लिए जरूरी है कि गणतंत्र की शक्ति धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों से ऊपर हो. धर्मनिरपेक्षता से संबंधित संविधान के 25 वें अनुच्छेद को यदि सही तरीके से समझ जाए तो यह कहता है कि राज्य लोगों के आर्थिक, राजनैतिक, और सामाजिक अधिकारों के बंटवारे के मामले में निरपेक्ष रहेगा और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं बरतेगा. नई सरकार चुनावी लाभों को एक तरफ रखकर धर्मनिरपेक्षता नीति पर चलते हुए इसका विकास करेगी.
आगे बताए गए दो उदाहरण से ये बात और स्पष्ट होगी - यदि कोई धार्मिक समूह यह कहता है जनसंख्या बढ़ाओ और अपना प्रभाव बढ़ाओ तो ऐसी हालत में जब कि देश की जनसंख्या पहले से अधिक है और संसाधन कम हैं तब सरकार कानून के माध्यम से जनसंख्या बढ़ोतरी पर अंकुश लगा सकती है.
दूसरा उदाहरण ये है कि यदि कोई व्यक्ति गलत राय के चलते यह कहे कि मैं अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण वंदे मातरम् नहीं गा सकता तो सरकार उसके मत का सम्मान तो करेगी लेकिन साथ ही सरकार के पास व्यक्ति को सरकारी स्कूल में दाखिला न देने का अधिकार भी होगा.
(29) बरसों तक दबाए और शोषित किए गए वर्ग को भारतीय संविधान विधायिका और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वकालत करता है. हमारे समाज में महिलाएं भी इसी तबके का हिस्सा हैं. लोकतांत्रिक सिद्धांत कहते हैं कि संसद की आधी सीटे महिलाओं के लिए आरक्षित होती चाहिए लेकिन तोलमोल के बाद ये तय किया गया कि कुल सीटों की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. लेकिन यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस प्रस्ताव का विरोध होता रहा और इसे आज तक कानून नहीं बनाया जा सका. अगली सरकार और संसद को कोशिश करनी चाहिए कि अपने पहले छह महीनों के भीतर ही इसे कानून बना दिया जाए. इससे हमारी संसद न सिर्फ ज्यादा महत्वपूर्ण और व्यवस्थित होगी बल्कि इसमें विविधता भी आएगी.
(30) इस पत्र के माध्यम से हम जनता को सलाह देना चाहते हैं कि वे ईमानदार और उच्च व उदारवादी शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों की पहचान करें और उन्हें चुनें. जिनका अतीत इस बात को सुनिश्चित करता हो कि ये सत्ता में आने के बाद अपने सिद्धांतों को न छोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय शांति और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्धता से काम करेंगे.
(राम जेठमलानी)